हमारे गाँव की चौपाल कुछ अलग ही तरीके से मंडती है.यहाँ हर घर के आगे चुन्तरी कोई न कोई बुजुर्ग बैठा हुआ हथाई करते हुए मिल जायेगा. कई बुजुर्ग कहानियाँ किस्से सुनाकर भलाई का सन्देश प्रसारित करते हैं तो कई हुक्का भरकर बैठक जमाते हैं. नीम के नीचे चौपड़, ताश, चर-भर, शतरंज आदि खेलते हुए मिल जायेंगे. गाँव में हर कोई भलाई का कम करता मिल जायेगा. यहाँ हर रोज शाम के समय खाना खाने के बाद बैठक और कहानी किस्सों का दौर शुरू होता है तो रात रात भर चलता रहता है. सुबह से लेकर शाम तक खेती बाड़ी और बैठकों के बीच गाँव की चौपाल चलती रहती है.
जिंदगी में रस घोल दिया शहद ने- jindgi me shahad ghol diya shahad ne
हनुमानगढ़ जिले के परलीका व रामगढ़ गांवों के किसानों व शिक्षित युवकों का रुझान मधुमक्खी पालन की ओर बढ़ रहा है और इलाके के करीब एक दर्जन नौजवानों ने इसे व्यवसाय के रूप में अपनाया है। युवा किसानों के अनुसार यह व्यवसाय किसानों के लिए काफी लाभप्रद साबित हो रहा है और शहद ने उनकी जिंदगी में रस घोल दिया है।
परलीका में इसकी शुरुआत प्रगतिशील युवा किसान मुखराम सहारण ने की। वे वर्ष 2005 से लगातार शहद उत्पादन कर रहे हैं। शुरू में जानकारियों के अभाव में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, मगर बाद में कृषि एवं उद्यान विभाग व कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा उपलब्ध सुविधाओं तथा प्रशिक्षण से यह व्यवसाय काफी आसानी से होने लगा है। मुखराम से व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर इसी गांव के युवक सतवीर बैनीवाल तथा नरेश जांगिड़ ने भी इस व्यवसाय को अपनी आजीविका का साधन बनाया है। समीपवर्ती रामगढ़ ग्राम में युवक मीठूसिंह, सज्जन राहड़, सुरेन्द्र भाम्भू, बगड़ावतसिंह भाम्भू, पवन नैण आदि भी पूर्ण सफलता के साथ शहद उत्पादन कर रहे हैं। इन किसानों के पास मधुमक्खियों के 200 से अधिक बक्से हैं जिन्हें अब तक सरसों के खेतों में रखा गया था और अब हरियाणा के किन्नू-माल्टा बागानों में भेज दिया गया है।
शहद उत्पादकों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से दिया जाने वाला अनुदान व अन्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं तथा राज्य सरकार की उदासीनता से यह व्यवसाय अधिक प्रगति नहीं कर पा रहा है। सरकार अगर पर्याप्त सहयोग करे और सम्बन्धित उपकरण व तकनीकों की जानकारी उपलब्ध करवाए तो इस व्यवसाय से शहद के साथ-साथ मोम, रायलजैली, मोनोविष आदि का भी उत्पादन सम्भव है।
परलीका में इसकी शुरुआत प्रगतिशील युवा किसान मुखराम सहारण ने की। वे वर्ष 2005 से लगातार शहद उत्पादन कर रहे हैं। शुरू में जानकारियों के अभाव में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा, मगर बाद में कृषि एवं उद्यान विभाग व कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा उपलब्ध सुविधाओं तथा प्रशिक्षण से यह व्यवसाय काफी आसानी से होने लगा है। मुखराम से व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर इसी गांव के युवक सतवीर बैनीवाल तथा नरेश जांगिड़ ने भी इस व्यवसाय को अपनी आजीविका का साधन बनाया है। समीपवर्ती रामगढ़ ग्राम में युवक मीठूसिंह, सज्जन राहड़, सुरेन्द्र भाम्भू, बगड़ावतसिंह भाम्भू, पवन नैण आदि भी पूर्ण सफलता के साथ शहद उत्पादन कर रहे हैं। इन किसानों के पास मधुमक्खियों के 200 से अधिक बक्से हैं जिन्हें अब तक सरसों के खेतों में रखा गया था और अब हरियाणा के किन्नू-माल्टा बागानों में भेज दिया गया है।
शहद उत्पादकों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से दिया जाने वाला अनुदान व अन्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं तथा राज्य सरकार की उदासीनता से यह व्यवसाय अधिक प्रगति नहीं कर पा रहा है। सरकार अगर पर्याप्त सहयोग करे और सम्बन्धित उपकरण व तकनीकों की जानकारी उपलब्ध करवाए तो इस व्यवसाय से शहद के साथ-साथ मोम, रायलजैली, मोनोविष आदि का भी उत्पादन सम्भव है।
हनुमानगढ़ जिले में 150 इकाइयां स्थापित
कृषि विज्ञान केन्द्र संगरिया के विषय विशेषज्ञ (पौध संरक्षण) डॉ. उमेश कुमार का कहना है कि हनुमानगढ़ जिले में मधुमक्खी पालन की लगभग 150 इकाइयां स्थापित
हो चुकी हैं। इस क्षेत्र में बीटी कपास के क्षेत्रफल में वृद्धि होने से कीटनाशकों का प्रयोग 30 प्रतिशत तक कम हुआ है, जिस कारण से इस व्यवसाय को भी अपरोक्ष रूप से अच्छा लाभ हुआ है और शहद का उत्पादन भी बढ़ा है। इस वर्ष शहद के भाव बढऩे से भी उत्पादकों का हौसला बढ़ा है। उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों के लिए मधुमक्खी पालन पर प्रतिवर्ष पांच दिवसीय नि:शुल्क प्रशिक्षण शिविर आयोजित करता है। इसी प्रकार उद्यान विभाग प्रति बक्से पर 400 तथा प्रति कॉलोनी 350 रुपयों का अनुदान भी देता है।
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-सज्जन राहड़, मधुमक्खी पालक, रामगढ़।
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''मैं घणो पढेड़ो कोनी, पण मेरै खातर ओ रोजगार वरदा
न साबित होयो है। कई नौजवान साथी ईं काम नै मिलगे कर सकै। बेरोजगारी गै जमानै में आज हाथ पर हाथ धरगे बैठणै गी बजाय ईं तरियां गा रोजगार करणा चइयै।''
-मुखराम सहारण, मधुमक्खी पालक, परलीका।
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-नरेश जांगिड़, मधुमक्खी पालक, परलीका।
फोटो- 1. परलीका में बक्सों से शहद निकालते हुए मधुमक्खी पालक। 2. डॉ. उमेश कुमार 3. सज्जन राहड़ 4. मुखराम सहारण 5. नरेश जांगिड़।
कामयाबी की कहानी-लालसिंह की जुबानी- Lalsingh Beniwal
कामयाबी की कहानी-लालसिंह की जुबानी
मैंने जब अपनी युवावस्था में खेती करनी शुरू की तब कृषि क्षेत्र में रसायन का बड़ा बोलबाला था। कृषि विभाग की सिफारिश से कम रसायन देने पर भी फसल उत्पादन बहुत अच्छा होता था। कीटनाशक मामूली देने पर भी कीड़ों का फसलों पर नियंत्रण हो जाता था। मैं एक या दो स्प्रे किया करता था। फसलों में भूमि-जनित बीमारियां ना के बराबर थी। सन् १९९० के बाद पैदावार में गिरावट आने लगी। कारण था कीटनाशकों और रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल। कृषि वैज्ञानिक व कृषि विभाग का भी रसायनीकरण हो गया।
मैं कृषि विभाग का सम्पर्क काश्तकार हूं। विभाग को याद आया जैविक खेती का फार्मूला। गोबर की खाद, जीवाणु, बायो खाद। हम किसानों में प्रचार किया गया। इसको मैंने अपनाया सन् १९९४ में। मैंने आईपीएम का प्रशिक्षण लिया। इससे पहले मुझे मित्र व दुश्मन कीड़ों के जीवन चक्र का कोई ज्ञान नहीं था। एक ही तरीका था, जैसा भी कीट है, हमारी फसल का दुश्मन है। प्रशिक्षण के बाद मुझे पता चला कि मेरे खेत में तो मित्र कीटों की फौज खड़ी है, जिनको अनजाने में हमने मार दिया। आईपीएम मतलब समन्वित कीट प्रबंधन से मुझे बड़ा भारी सहयोग मिला। आज मैं आईपीएम आधारित खेती करता हूं। गर्मी में गहरी जुताई, फसल चक्र, समय पर फसल बिजाई, पौधों से पौधों की निश्चित दूरी, जिससे मेरी फसल को हवा, सूर्य की रोशनी अच्छी तरह से मिल सके। फसल पर दुश्मन कीड़ों की मात्रा नुकसान स्तर से ऊपर आने की स्थिति में ही मैं कीटनाशक का इस्तेमाल करता हूं। इससे पहले नीम, मित्र फंफूद, एनपीवी वायरस आदि का इस्तेमाल करता हूं।
२००१-०२ में मेरे यहां भयंकर सूखा पड़ा। फसलों को तो पानी कहां, पीने के पानी की नौबत आ गई। नहर में भी पानी दो महीने से आने लगा। मेरे लड़कों ने शहर जाकर मजदूरी करने का मन बना लिया। मेरी इच्छा नहीं थी कि शहर जाकर मेरे बच्चे मजदूरी करें, पर कर भी क्या सकता था। इस गम्भीर संकट की घड़ी में भी बलवीरसिंह जी मसीहा बनकर आए और मुझे जल प्रबंधन का पाठ पढ़ाया। कहा- डिग्गी बनाओ और बूंद-बूंद व फव्वारा सिंचाई अपनाओ। कुछ जमीन पर आप सब्जी लगाओ, जिसमें मुख्य मिर्च की फसल हो। खेती मिश्रित करो। पशुपालन, मोम, मछली आदि। जिससे रोज आमदनी हो। आज मैं रोजाना नगदी आमदनी ले रहा हूं।
मुझे कई अवार्ड मिले हैं। २८ मार्च २०१० को भी जिला स्तरीय पुरस्कार मुख्यमंत्री व कृषिमंत्री जी से लिया है। ये जो भी सम्मान मुझे मिले हैं, वे मुझे आगे और काम करने को मजबूर करते हैं। मेरे हर वक्त मन में यही रहता है कि तेरे इन बहुमूल्य सम्मानों की इज्जत बनी रहे। मैं अपनी मां भाषा राजस्थानी का सम्मान करता हूं और अपने गांव के स्कूल में राजस्थानी भाषा की दस हजार रुपए की किताबें भी भेंट की हैं। मैं चाहता हूं कि अन्य प्रान्तों की भांति किसानों को सारी जानकारियां उनकी मां भाषा में ही दी जाए। मैं गऊशाला में भी हर साल कुछ न कुछ अपना हिस्सा देता हूं। आज मैं अपने कृषि अधिकारियों के सहयोग से आसपास के किसानों को ट्रेनिंग भी देता हूं, जिससे मेरे किसान भाई लाभ उठा रहे हैं। मेरा कहना है कि कृषि क्षेत्र में आदमी को मेहनत करने की जरूरत है। कामयाबी अपने आप मिलेगी। यह मत देखो कि फलां आदमी फैल हुआ। यह देखो कि लालसिंह कामयाब कैसे हुआ। आदमी की उम्र बहुत कम है। इस थोड़े से समय में अपने देश, गांव, समाज और अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करो, जो कि आने वाली पीढ़ी हमें सम्मान के साथ याद करे।
ख्याली ने किया परलीका डॉट कॉम का लोकार्पण
'गांव की माटी से जुड़ाव जरुरी'
ख्याली ने किया परलीका डॉट कॉम का लोकार्पण
परलीका. इंसान कहीं भी चला जाए मगर उसे अपनी माटी
इस अवसर पर चित्रकार महेंद्र प्रताप शर्मा ने नोहर से ऑनलाइन विडिओ संवाद के माध्यम से ख्याली का स्वागत किया। अजय सोनी ने वेबसाइट का परिचय देते हुए बताया कि इसमें गांव की ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भौगोलिक स्थितियों की जानकारी को सहेजा गया है तथा प्रतिदिन नवीनतम गतिविधियों को भी इस साइट पर प्रदर्शित किया जाएगा। इस अवसर पर साहित्यकार डॉ. सत्यनारायण सोनी, विनोद स्वामी तथा बसंत राजस्थानी भी उपस्थित थे।