कामयाबी की कहानी-लालसिंह की जुबानी- Lalsingh Beniwal

कामयाबी की कहानी-लालसिंह की जुबानी
मैं लालसिंह पुत्र श्री भाणाराम बैनीवाळ, गांव-परलीका, तहसील-नोहर, जिला-हनुमानगढ़, राजस्थान का वासी हूं। मेरी उम्र ५४ साल, शिक्षा आठवीं पास। एक बेटी और दो बेटे शादीशुदा। कृषि भूमि ५ हैक्टर। पिछले ३५ सालों से खेतीबाड़ी कर रहा हूं। मेरे पास विरासत में मिली ३ हैक्टर जमीन थी, जिस पर रिहायशी मकान भी है।
मैंने जब अपनी युवावस्था में खेती करनी शुरू की तब कृषि क्षेत्र में रसायन का बड़ा बोलबाला था। कृषि विभाग की सिफारिश से कम रसायन देने पर भी फसल उत्पादन बहुत अच्छा होता था। कीटनाशक मामूली देने पर भी कीड़ों का फसलों पर नियंत्रण हो जाता था। मैं एक या दो स्प्रे किया करता था। फसलों में भूमि-जनित बीमारियां ना के बराबर थी। सन् १९९० के बाद पैदावार में गिरावट आने लगी। कारण था कीटनाशकों और रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल। कृषि वैज्ञानिक व कृषि विभाग का भी रसायनीकरण हो गया। अगर इन्होंने जैविक खाद की सिफारिश की भी तो पिछले दरवाजे से। विभाग की इस ढील का असर हम पर भी हुआ और फलस्वरूप जमीन में जीवांश की कमी आने से पैदावार भी निरंतर गिरने लगी। हमारे मित्र कीट जहर की भेंट चढ़ गए। यह सब हुआ हमारी नासमझी और कृषि विभाग की गलती के कारण। सन् १९६५ से १९९० के बीच के २५ वर्षों की गलती की सजा आज किसान, कृषि विभाग तथा हमारी सरकार सब भुगत रहे हैं।
मैं कृषि विभाग का सम्पर्क काश्तकार हूं। विभाग को याद आया जैविक खेती का फार्मूला। गोबर की खाद, जीवाणु, बायो खाद। हम किसानों में प्रचार किया गया। इसको मैंने अपनाया सन् १९९४ में। मैंने आईपीएम का प्रशिक्षण लिया। इससे पहले मुझे मित्र व दुश्मन कीड़ों के जीवन चक्र का कोई ज्ञान नहीं था। एक ही तरीका था, जैसा भी कीट है, हमारी फसल का दुश्मन है। प्रशिक्षण के बाद मुझे पता चला कि मेरे खेत में तो मित्र कीटों की फौज खड़ी है, जिनको अनजाने में हमने मार दिया। आईपीएम मतलब समन्वित कीट प्रबंधन से मुझे बड़ा भारी सहयोग मिला। आज मैं आईपीएम आधारित खेती करता हूं। गर्मी में गहरी जुताई, फसल चक्र, समय पर फसल बिजाई, पौधों से पौधों की निश्चित दूरी, जिससे मेरी फसल को हवा, सूर्य की रोशनी अच्छी तरह से मिल सके। फसल पर दुश्मन कीड़ों की मात्रा नुकसान स्तर से ऊपर आने की स्थिति में ही मैं कीटनाशक का इस्तेमाल करता हूं। इससे पहले नीम, मित्र फंफूद, एनपीवी वायरस आदि का इस्तेमाल करता हूं।
सन् १९९७ में कपास की फसल पर अमेरिकन सूंडी ने पूरे उत्तर भारत में कहर मचा रखा था। कपास की फसल को इसने बर्बाद कर दिया। मैंने इन विपरीत परिस्थितियों में भी सघन कपास प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रथम पुरस्कार जीता। जिसमें मुझे २५ हजार रुपए नगद, स्मृति चिह्न व केन्द्रीय कृषि महानिदेशक श्री राजेन्द्र सिंह परोदा के हाथों से कपास अनुसंधान केन्द्र, नागपुर से वरीयता प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया और प्रगतिशील किसान के रूप में चयन किया। मैंने प्रति हैक्टर ३३ क्विंटल कपास निकालकर उस समय रिकॉर्ड स्थापित किया था। इस सम्मान ने मेरे हौसले और बढ़ाए। मेरा सम्पर्क हुआ एक नौजवान कृषि अधिकारी से जो ढूंढ़ रहा था अपने क्षेत्र में कर्मठ किसान और चाहता था कि कृषि में बड़े भारी बदलाव की जरूरत है और इसको मैं अपने किसानों से करवाऊंगा। अधिकारी का नाम है बलवीरसिंह जांगिड़। नोहर में सहायक निदेशक के पद पर। अपने आप में एक कृषि सुपरवाइजर हैं। जिन्होंने मुझे जैविक खेती के लिए प्रेरित किया। मुझे दूसरे राज्यों में फार्म भ्रमण करवाया और बताया कि लालसिंहजी, कृषि क्षेत्र में बहुत कुछ है। थोड़ा-सा बदलाव करने की जरूरत है। इन्होंने मेरे से मेरे खेेत पर केंचुए की एक यूनिट लगवाई, जिससे आसपास के किसानों को दिलवाकर जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया।
२००१-०२ में मेरे यहां भयंकर सूखा पड़ा। फसलों को तो पानी कहां, पीने के पानी की नौबत आ गई। नहर में भी पानी दो महीने से आने लगा। मेरे लड़कों ने शहर जाकर मजदूरी करने का मन बना लिया। मेरी इच्छा नहीं थी कि शहर जाकर मेरे बच्चे मजदूरी करें, पर कर भी क्या सकता था। इस गम्भीर संकट की घड़ी में भी बलवीरसिंह जी मसीहा बनकर आए और मुझे जल प्रबंधन का पाठ पढ़ाया। कहा- डिग्गी बनाओ और बूंद-बूंद व फव्वारा सिंचाई अपनाओ। कुछ जमीन पर आप सब्जी लगाओ, जिसमें मुख्य मिर्च की फसल हो। खेती मिश्रित करो। पशुपालन, मोम, मछली आदि। जिससे रोज आमदनी हो। आज मैं रोजाना नगदी आमदनी ले रहा हूं।
मुझे कई अवार्ड मिले हैं। २८ मार्च २०१० को भी जिला स्तरीय पुरस्कार मुख्यमंत्री व कृषिमंत्री जी से लिया है। ये जो भी सम्मान मुझे मिले हैं, वे मुझे आगे और काम करने को मजबूर करते हैं। मेरे हर वक्त मन में यही रहता है कि तेरे इन बहुमूल्य सम्मानों की इज्जत बनी रहे। मैं अपनी मां भाषा राजस्थानी का सम्मान करता हूं और अपने गांव के स्कूल में राजस्थानी भाषा की दस हजार रुपए की किताबें भी भेंट की हैं। मैं चाहता हूं कि अन्य प्रान्तों की भांति किसानों को सारी जानकारियां उनकी मां भाषा में ही दी जाए। मैं गऊशाला में भी हर साल कुछ न कुछ अपना हिस्सा देता हूं। आज मैं अपने कृषि अधिकारियों के सहयोग से आसपास के किसानों को ट्रेनिंग भी देता हूं, जिससे मेरे किसान भाई लाभ उठा रहे हैं। मेरा कहना है कि कृषि क्षेत्र में आदमी को मेहनत करने की जरूरत है। कामयाबी अपने आप मिलेगी। यह मत देखो कि फलां आदमी फैल हुआ। यह देखो कि लालसिंह कामयाब कैसे हुआ। आदमी की उम्र बहुत कम है। इस थोड़े से समय में अपने देश, गांव, समाज और अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करो, जो कि आने वाली पीढ़ी हमें सम्मान के साथ याद करे।

1 टिप्पणियाँ:

Vikram Jangir ने कहा…

Proud on my honourable father Dr Balbir Singh Jangir

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